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गुरुवार, 18 दिसंबर 2014

जीवन का आधार ............. आयुर्वेद

जीवन का आधार ............. आयुर्वेद
WHO कहता है कि भारत में ज्यादा से ज्यादा केवल 350 दवाओं
की आवश्यकता है | अधितम केवल 350 दवाओं की जरुरत है, और
हमारे देश में बिक रही है 84000 दवाएं | यानी जिन दवाओं
कि जरूरत ही नहीं है वो डॉक्टर हमे खिलते है
क्यों कि जितनी ज्यादा दवाए बिकेगी डॉक्टर का कमिसन
उतना ही बढेगा|
एक बात साफ़ तौर पर साबित होती है कि भारत में
एलोपेथी का इलाज कारगर नहीं हुवा है | एलोपेथी का इलाज
सफल नहीं हो पाया है| इतना पैसा खर्च करने के बाद
भी बीमारियाँ कम नहीं हुई बल्कि और बढ़ गई है | यानी हम
बीमारी को ठीक करने के लिए जो एलोपेथी दवा खाते है उससे
और नई तरह की बीमारियाँ सामने आने लगी है |
ये दवा कंपनिया बहुत बड़ा कमिसन देती है डॉक्टर को|
यानी डॉक्टर कमिशनखोर हो गए है या यूँ कहे की डॉक्टर
दवा कम्पनियों के एजेंट हो गए है|
सारांस के रूप में हम कहे कि मौत का खुला व्यापार धड़ल्ले से पूरे
भारत में चल रहा है तो कोई गलत नहीं होगा|
फिर सवाल आता है कि अगर इन एलोपेथी दवाओं का सहारा न
लिया जाये तो क्या करे ? इन बामारियों से कैसे निपटा जाये ?
........... तो इसका एक ही जवाब है आयुर्वेद |
एलोपेथी के मुकाबले आयुर्वेद श्रेष्ठ क्यों है ? :-
(1) पहली बात आयुर्वेद की दवाएं किसी भी बीमारी को जड़ से
समाप्त करती है, जबकि एलोपेथी की दवाएं
किसी भी बीमारी को केवल कंट्रोल में रखती है|
(2) दूसरा सबसे बड़ा कारण है कि आयुर्वेद का इलाज
लाखों वर्षो पुराना है, जबकि एलोपेथी दवाओं की खोज कुछ
शताब्दियों पहले हुवा |
(3) तीसरा सबसे बड़ा कारण है कि आयुर्वेद की दवाएं घर में, पड़ोस
में या नजदीकी जंगल में आसानी से उपलब्ध हो जाती है,
जबकि एलोपेथी दवाएं ऐसी है कि आप गाँव में रहते
हो तो आपको कई किलोमीटर चलकर शहर आना पड़ेगा और
डॉक्टर से लिखवाना पड़ेगा |
(4) चौथा कारण है कि ये आयुर्वेदिक दवाएं बहुत ही सस्ती है
या कहे कि मुफ्त की है, जबकि एलोपेथी दवाओं कि कीमत बहुत
ज्यादा है| एक अनुमान के मुताबिक एक
आदमी की जिंदगी की कमाई का लगभग 40%
हिस्सा बीमारी और इलाज में ही खर्च होता है|
(5) पांचवा कारण है कि आयुर्वेदिक दवाओं का कोई साइड
इफेक्ट नहीं होता है, जबकि एलोपेथी दवा को एक बीमारी में
इस्तेमाल करो तो उसके साथ दूसरी बीमारी अपनी जड़े मजबूत
करने लगती है|
(6) छटा कारण है कि आयुर्वेद में सिद्धांत है कि इंसान
कभी बीमार ही न हो | और इसके छोटे छोटे उपाय है जो बहुत
ही आसान है | जिनका उपयोग करके स्वस्थ रहा जा सकता है |
जबकि एलोपेथी के पास इसका कोई सिद्दांत नहीं है|
(7) सातवा बड़ा कारण है कि आयुर्वेद का 85% हिस्सा स्वस्थ
रहने के लिए है और केवल 15% हिस्सा में आयुर्वेदिक
दवाइयां आती है, जबकि एलोपेथी का 15% हिस्सा स्वस्थ रहने
के लिए है और 85% हिस्सा इलाज के लिए है |

तंबाकू की लत छुड़ाने के घरेलू नुस्खे.......


तंबाकू की लत छुड़ाने के घरेलू नुस्खे
तंबाकू खाने की आदत छुड़ाने में मनोवैज्ञानिक सलाह के
अलावा निम्नलिखित घरेलू नुस्खे भी अपनाए जा सकते हैं -
बारीक सौंफ के साथ मिश्री के दाने मिलाकर धीरे-धीरे चूसें,
नरम हो जाने पर चबाकर खा जाएं।
अजवाइन साफ कर नींबू के रस व काले नमक में दो दिन तक भींगने
दें। इसे छांव में सुखाकर रख लें। इसे मुंह में रखकर चूसते रहें।
छोटी हरड़ को नींबू के रस व सेंधा नमक (पहाड़ी नमक) के घोल में
दो दिन तक फूलने दें। इसे निकाल कर छांव में सुखाकर शीशी में भर
लें और इसे चूसते रहें। नरम हो जाने पर चबाकर खा लें।
तंबाकू सूंघने की आदत छोड़ने के लिए गर्मी के मौसम में केवड़ा,
गुलाब, खस आदि के इत्र का फोहा कान में लगाएं।
सर्दी के मौसम में तंबाकू खाने की इच्छा होने पर हिना की खुशबू
का फोहा सूंघें।
खाने की आदत को धीरे-धीरे छोड़ें। एकदम बंद न करें, क्योंकि रक्त
में निकोटिन के स्तर को क्रमशः ही कम किया जाना चाहिए।

कान का बहना :

कान का बहना :
सुबह उठने के बाद पानी में नींबू को निचोड़कर पीने से कान से
मवाद बहना कम हो जाता है।
बिजौरा नींबू के रस में थोड़ी-सी सज्जीखार मिलाकर कान में
बूंदों के रूप में डालने से कान में से बहने वाला पीव बन्द होता है।
नींबू के 200 मिलीलीटर रस में सरसों का या तिल का तेल
मिलाकर अच्छी तरह उबाल लें। पकने पर छानकर बोतल में भरकर रख
लें। उसमें से 2-2 बूंद कान में डालते रहने से कान में पीव, खुजली, दर्द
और बहरेपन में लाभ पहुंचाता है।
प्यास अधिक लगना :
नींबू की पत्ती को मिट्टी में मिलाकर गोली बना लें। इस
गोली को आग में पकाकर 1 गिलास पानी में डालकर बुझाएं।
फिर उस पानी को कपड़े से छानकर पिलायें। इससे बुखार व अन्य
रोगों में लगने वाली प्यास मिटती है और गले का सूखना बन्द
हो जाता है।
नीबू को 1 गिलास पानी में निचोड़कर पीने से तेज प्यास
का लगना बन्द हो जाता है।
नींबू का शर्बत पीने से प्यास शान्त होती है।
गर्मी में नींबू के रस को शीतल (ठंड़े) पानी में मिला लें, फिर उसमें
चीनी डालकर शिकंजी बना लें। इसे पीने से गर्मी नष्ट होती है
और प्यास शान्त होती है।
कब्ज :
1 नींबू का रस 1 गिलास गर्म पानी के साथ रात में सोते समय लेने
से पेट साफ हो जाता है। नींबू का रस 15 मिलीलीटर और शक्कर
(चीनी) 15 ग्राम लेकर 1 गिलास पानी में मिलाकर रात
को पीने से पुरानी कब्ज दूर हो जाती है।
नींबू के रस में सेंधानमक मिलाकर सेवन करने से पेट की बीमारी और
गैस बाहर निकल जाती है।
1 गिलास गुनगुने पानी में एक नींबू का रस व एक चम्मच शहद
मिलाकर पीने से कब्ज दूर होती है और शरीर का वजन घटने
लगता है।
नींबू का रस, 200 मिलीलीटर हल्का गर्म पानी, 5 मिलीलीटर
अदरक का रस और 10 ग्राम शहद मिलाकर सेवन करने से कब्ज दूर
होती है।
5 मिलीलीटर नींबू के रस को 200 मिलीलीटर पानी के
मिलाकर उसमें 10 ग्राम मिश्री घोलकर पीने से कब्ज
(कोष्ठबद्धता) में लाभ मिलता है।
गन्ने का रस गर्म करके नींबू के रस के साथ सुबह के समय लेने से लाभ
होता है।
नींबू का रस 2 चम्मच, चीनी 5 ग्राम को मिलाकर शर्बत बना लें।
4-5 दिन तक लगातार पीने से लाभ होता है।
नींबू के रस में थोड़ी-सी पिसी हुई कालीमिर्च को डालकर सेवन
करना चाहिए।
गर्भवती स्त्रियों की उल्टी :
नींबू के रस को पानी में मिलाकर सुबह पिलाने से वमन (उल्टी) में
आराम आता है और भोजन आसानी से पचता है।
पेट दर्द :
नींबू के टुकड़ों पर कालानमक, कालाजीरा और कालीमिर्च
का पिसा हुआ चूर्ण डालकर चाटने से लाभ होता है।
1 छोटा चम्मच कागजी नींबू के रस में 1 चुटकी कालानमक
पिसा हुआ नमक और 1 कप गुनगुने पानी को अच्छी तरह मिलाकर
रोगी को देने से पेट के दर्द में आराम मिलता है।
नींबू को काटकर इसके टुकड़ों पर अजवायन और कालानमक
डालकर धीमी आग पर गर्म करके चूसें। इससे पेट दर्द में काफी लाभ
होता है।
1 चम्मच नींबू और अदरक का रस मिलाकर चाटने से पेट के दर्द में
आराम मिलता है।
आधे नींबू के रस में थोड़ा-सा सेंधानमक मिलाकर 100
मिलीलीटर पानी में डालकर पीने से पेट के दर्द में आराम होता है।
नींबू के रस में शहद और थोड़ा-सा जवाखार मिलाकर चाटने से
लाभ होता है।
12 मिलीलीटर नींबू का रस, 6 ग्राम शहद और 6 मिलीलीटर
अदरक के रस को 1 कप पानी में मिलाकर पीने से पेट के दर्द में लाभ
मिलता है।
नींबू का रस 3 मिलीलीटर, चूने का पानी 10 मिलीलीटर, शहद
10 ग्राम तीनों को मिलाकर 20-20 बूंद लें। इससे पेट दर्द और
अजीर्ण (मन्दाग्नि) दोनों बीमारियों में लाभ मिलता है।
कच्चे नींबू का छिलका दिन में 2 से 3 बार खाने से पेट में होने वाले
बादी का दर्द मिटता जाता है।
नींबू की फांकों में कालानमक, कालीमिर्च और जीरा भरकर गर्म
करके चूसने से पेट का दर्द ठीक हो जाता है और पेट के कीड़े खत्म
हो जाते हैं।
डकार और जुलाब आने पर:
बिजौरे की जड़, अनार की जड़ और केशर पानी में घोटकर पिलाने
से डकार और जुलाब की बीमारी में आराम होता है।
पथरी :
बिजौरे नींबू के रस में सेंधानमक मिलाकर पिलाने से पथरी दूर
होती है।
नींबू के रस में सेंधानमक मिलाकर कुछ दिनों तक नियमित पीने से
पथरी गल जाती है।
शक्ति वर्धक :
1 गिलास गर्म पानी में 1 नींबू को निचोड़कर पीते रहने से शरीर
के अंग-अंग में नई शक्ति महसूस होती है। इससे
आंखों की रोशनी बढ़ती है। मानसिक कमजोरी, सिर में दर्द और
पुट्ठों में झटके लगना बन्द हो जाते हैं। अधिक मेहनत के कारण आई
कमजोरी में बिना नमक या चीनी मिलाकर छोटे-छोटे घूंटों में
पीने से कमजोरी नहीं रहती है। ध्यान रहे कि पथरी के
रोगी को नींबू नहीं देना चाहिए।
40 ग्राम किशमिश, 6 मुनक्का, 6 बादाम और 6 पिस्ते रात
को आधे किलो पानी में कांच के बर्तन में भिगो दें। सुबह उठकर
पीसकर, छान लें और 1 चम्मच शहद और 1 नींबू निचोड़कर भूखे पेट
पीयें। इससे मानसिक व शारीरिक कमजोरी तथा थकान दूर
होती है।
खून की कमी या न बनना (रक्तक्षीणता) :
नींबू और टमाटर का रस सेवन करने खून की कमी दूर होती है।
यदि पाचन अंग कार्य नहीं करते, भोजन नहीं पचता, पेट में गैस
बनती हो तो एक गिलास गर्म पानी में एक नींबू का रस मिलाकर
बार-बार पीते रहने से पाचन अंगों की धुलाई हो जाती है
तथा खून और शरीर के समस्त विषैले पदार्थ पेशाब के द्वारा बाहर
निकल जाते हैं।
2 चम्मच नीबू के रस में आधा कप टमाटर का रस मिलाकर
प्रतिदिन सुबह और शाम 20 दिन तक पीने से रोग में लाभ
मिलता है।
खून के बहने पर (रक्तस्राव) :
1 कप गर्म दूध में आधा नींबू को निचोड़कर दूध फटने से तुरन्त पहले
पीने से खून का बहना बन्द हो जाता है। ध्यान रहे कि इस प्रयोग
को 1 या 2 बार से अधिक न करें।
फेफड़े, आमाशय, गुर्दे, गर्भाशय और मूत्राशय से खून के आने पर नींबू
का रस ठंड़े पानी में मिलाकर दिन में 3 बार पीने से खून
का बहना बन्द हो जाता है।
खून की शुद्धि के लिए :
नींबू को गर्म पानी में मिलाकर रोजाना दिन में 3 बार
पीना चाहिए। पानी को चाय की तरह गर्म करके खून की सफाई
होती है।

स्वस्थ रहने के खास नुस्सके -----

स्वस्थ रहने के खास नुस्सके -----
(१)खड़े -खड़े पानी पीने से घुटनों में दर्द की बीमारी होती है
इसलिए खाना पीना बैठ कर करना चाहिए .
(२)नक्क्सीर आने पर तुरंत नाक में देशीघी लगाना चाहिए ,नाक से
खून आना तुरंत बंद हो जाता है
(३)बच्चों को पेशाब ना उतारे तो स्नान घर में ले जाकर टूटी खोल
दें पानी गिराने की आवाज़ सुनकरबच्चे का पेशाब उतर जायेगा
(४)बस में उलटी आती हो तो सीट पर अखबार रखकर बैठने
से ,उलटी नहीं आती
(५)कद बढ़ाने के लिए अश्वगंधा व मिश्रीबराबर मात्र में चूरन
बना कर १ चम्मच भोजन के बाद ले
(६)बाल गिरने लगें हों तो १००ग्राम नारियल तेल में १०ग्राम
देशी कपूर मिलाकर जड़ों में लगायें
(७)सर में खोरा हो ,शरीर पर सूखी खुजली हो तो भी इसी तेल
को लगाने से लाभ मिलता है
(८)दिन में दो बार खाना ,तो दो बार शौच
भी जाना चाहिए ,क्योंकि "रुकावट" ही रोग होता है
(९)आधा सर दर्द होने पर,दर्द होने वाली साईड की नाक में २-३
बूँद सरसों का तेल जोर से सूंघ लें
(१०)जुकाम होने पर सुहागे का फूला १ चम्मच ,गर्म पानी में घोल
कर पी लें १५ मिनट में जुकाम गायब

बुधवार, 17 दिसंबर 2014

अरुचि (भूख का कम लगना) :

अरुचि (भूख का कम लगना) :
सेंधानमक और कालीमिर्च फालसे में डालकर खाने से अरुचि (भूख
का कम लगना) रोग दूर होता है।
जलन (दाह):
फालसे का शर्बत बनाकर पीने से शरीर की जलन शांत
हो जाती है।
शरीर में दहक (जलन) का होना :
शरीर में दाह (जलन) होने पर पका फालसा शक्कर के साथ
मिलाकर खाने से आराम आता है।
हृदय रोग (दिल की बीमारी):
पके हुए फालसे का रस पानी, सौंठ और शक्कर को मिलाकर पीने
से दिल के रोग और पित्त विकार में लाभ मिलता है।
लू लगने पर:
500 ग्राम पके हुए फालसों को आधा लीटर पानी में 3-4 घंटे तक
भिगोकर रखें। इसके बाद इसे मसलकर कपड़े से छान लें फिर उसमें 500
ग्राम चीनी डालकर उबालें और शर्बत बनाकर साफ बोतलों में रख
लें। गर्मियों में इसमें पानी मिलाकर सेवन करने से यह ठंडक देता है,
रुचि पैदा करता है और लू के प्रकोप से भी बचाता है।
प्यास:
पके फालसों के रस में पानी मिलाकर पीने से तृषा (प्यास)
का रोग दूर होता है।
हिचकी:
फालसे के सेवन से कफ गलकर बाहर निकल जाता है। इससे
हिचकी और श्वास रोग में भी लाभ होता है।
गले के रोग में:
फालसे की छाल के कुल्ले करने से गले के रोगों में लाभ होता है।
मूत्रकृच्छ (पेशाब करने में कष्ट):
फालसे की छाल का काढ़ा बनाकर पीने से मूत्रकृच्छ (पेशाब करने
में कष्ट) और प्रमेह का रोग दूर हो जाता है।
घुटनों का दर्द :
फालसे के पेड़ की छाल का लेप करने से शारीरिक पीड़ा दूर
होती है। इसका लेप करने से आमवात (गठिया) रोग में भी लाभ
होता है।
फालसे के पेड़ की छाल का काढ़ा सेवन करने से आमवात (गठिया)
का रोग मिट जाता है।
वीर्य की कमजोरी:
पके हुए फालसे खाने से धातु की दुर्बलता दूर होती है।
अग्नि मांद्य (अपच):
कच्चे फालसों का सेवन करने से अग्निमांद्य (भूख कम लगना),
अतिसार (दस्त), प्रवाहिका (पेचिश, संग्रहणी) आदि रोग मिटते
हैं।
मूढ़गर्भ (गर्भ में मरा बच्चा) को निकालने के लिए :
फालसे के पेड़ की मूल (जड़) के लेप को स्त्री की नाभि,
बस्ति (नाभि के नीचे का हिस्सा) व योनि पर लेप करने से मूढ़गर्भ
या मृतगर्भ (मरा हुआ बच्चा) बाहर निकल आता है।
दिल के रोग :
पके फालसे के रस में पानी मिलाकर उसमें शक्कर और थोड़ी-
सी सोंठ की बुकनी डालकर शर्बत बनाकर पीने से पित्तविकार
यानि पित्तप्रकोप मिटता है। यह शर्बत हृदय (दिल) के रोग के
लिए लाभकारी होता है।
पके फालसे का सेवन करने से शरीर हष्ट-पुष्ट (मजबूत और ताकतवर)
बनता है। यह हृदय रोग और रक्तपित्त में
भी काफी हितकारी होता है।
फुंसियां:
फालसे के पत्तों तथा कलियों का लेप करने से फुंसियां समाप्त
हो जाती हैं।
गर्मी :
फालसे के फल का शर्बत सुबह-शाम खाने से गर्मी दूर होती है और
जलन से मुक्ति मिल जाती है।

विभिन्न रोगों में उपचार (Treatment of various diseases)

विभिन्न रोगों में उपचार (Treatment of various diseases)
1. आभिन्यास बुखार : त्रिकुटु, त्रिफला तथा मुस्तक जड़,
कटुकी प्रकन्द, निम्ब छाल, पटोल पत्र, वासा पुष्प व किरात
तिक्त के पंचांग (जड़, तना, पत्ती, फल और फूल) और
गुडूची को लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग की बराबर मात्रा लेकर
काढ़ा बना लें। इसे दिन में 3 बार लेने से आभिन्यास बुखार ठीक
हो जाता है।
2. सन्निपात बुखार : त्रिकुटा (सोंठ, मिर्च और पीपल),
त्रिफला (हरड़, बहेड़ा और आंवला), पटोल के पत्तें, नीम की छाल,
कुटकी, चिरायता, इन्द्रजौ, पाढ़ल और गिलोय
आदि को मिलाकर काढ़ा बना लें। इसका सेवन सुबह तथा शाम में
करने से सन्निपात बुखार ठीक हो जाता है।
3. खांसी : त्रिकुटा के बारीक चूर्ण में शहद मिलाकर चाटने से
खांसी ठीक हो जाती है।
4. कब्ज : त्रिकुटा (सोंठ, काली मिर्च और छोटी पीपल) 30
ग्राम, त्रिफला (हरड़, बहेड़ा और आंवला) 30 ग्राम, पांचों प्रकार
के नमक 50 ग्राम, अनारदाना 10 ग्राम तथा बड़ी हरड़ 10 ग्राम
को पीसकर चूर्ण बना लें। इसमें से 6 ग्राम रात को ठंडे पानी के
साथ लेने से कब्ज की शिकायत दूर हो जाती है।
5. जिगर (यकृत) का रोग : त्रिकुट, त्रिफला, सुहागे की खील,
शुद्ध गन्धक, मुलहठी, करंज के बीज, हल्दी और शुद्ध
जमालगोटा को बराबर मात्रा में लेकर बारीक पिसकर चूर्ण
बना लें। इसके बाद भांगरे के रस में मिलाकर 3 दिनों तक रख दें। इसे
बीच-बीच में घोटते रहे। फिर इसकी छोटी-
छोटी गोलियां बना लें और इसे छाया में सुखा लें। इसमें से 1-1
गोली खाना-खाने के बाद सेवन करने से यकृत के रोग में लाभ
मिलता है।
6. जलोदर (पेट में पानी भर जाना) : त्रिकुटा, जवाखार और
सेंधानमक को छाछ (मट्ठा) में मिलाकर पीने से जलोदर रोग ठीक
हो जाता है।
7. पेट का दर्द : त्रिकुटा, चीता, अजवायन, हाऊबेर, सेंधानमक और
कालीमिर्च को पीसकर चूर्ण मिला लें। इसे छाछ (मट्ठे) के साथ
सेवन करने से पेट का दर्द ठीक हो जाता है।
8. पीलिया : त्रिकुटा, चिरायता, बांसा, नीम की छाल,
गिलोय और कुटकी को 5-5 ग्राम की मात्रा में लेकर
काढ़ा बना लें। फिर इसे छानकर इसमें थोड़ा-सा शहद मिलाकर
सेवन करें। इससे पीलिया कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है।
9. बच्चों के रोग : त्रिकुटा, बड़ी करंज, सेंधानमक, पाढ़ और
पहाड़ी करंज को पीसकर इसमें शहद और घी मिलाकर
बच्चों को सेवन कराने से `सूखा रोग´ (रिकेट्स) ठीक हो जाता है।

जीरा : सुंगधित औषधि मसाला

जीरा : सुंगधित औषधि मसाला
* हिस्टीरिया के मरीज को गर्म पानी में नींबू, नमक, जीरा, हींग
भुनी हुई, पुदीना मिलाकर पिलाने से रोगी को लाभ मिलता है।
* जीरा चूर्ण, हींग चूर्ण एवं सेंधा नमक एक-एक चुटकी भर मिलाकर
लेने से पेट की गैस में लाभ मिलता है।
* उल्टी हो तो आधा नींबू का रस, एक पिलास पानी,
थोड़ा जीरा, दो छोटी इलायची पीसकर मिलाकर दो-दो घंटे
पर पिलाएं।
* लू लग जाने पर नारियल के पानी के साथ काला जीरा पीसकर
शरीर पर लेप करने से शांति मिलती है।
* दांत में कीड़ा लगने के कारण दर्द हो, तो पीपल, सेंधा नमक,
जीरा, सेमल का गोंद तथा हरड़ का बक्कल सम भाग लेकर पीसकर
बारीक चूर्ण बनाकर दांतों पर मलने से पर्याप्त लाभ मिलता है।
* थायरॉइड (गले की गांठ) में एक प्याला पालक के रस के साथ एक
चम्मच शहद और चौथाई चम्मच जीरे का चूर्ण मिलाकर सेवन करने से
लाभ होता है।
* सौंफ और जीरे के साथ सेवन करने से पेट की जलन में लाभ
होता है।

आयुर्वेद के हिसाब से जानिए कैसा है आपका शरीर

क्या आपको पता है कि आपका शरीर कैसा है? आयुर्वेद में शरीर
को तीन तरह का माना जाता है - वात, पित्त और कफ।
आयुर्वेद के अनुसार, हम सभी का शरीर इन तीनों में से किसी एक
प्रवृत्ति का होता है, जिसके अनुसार उसकी बनावट, दोष,
मानसिक अवस्था और स्वभाव का पता लगाया जा सकता है।
अगर आप अपने शरीर के बारे में इतना कुछ जान लेंगे तो यकीनन
अपनी सेहत से जुड़ी समस्याओं को हल करने और फिट रहने में
आपको मदद मिलेगी। तो जानिए, आखिर कैसा है
आपका शरीर।
वात युक्त शरीर
आयुर्वेद के अनुसार, वात युक्त शरीर का स्वामी वायु होता है।
बनावट - इस तरह के शरीर वाले लोगों का वजन तेजी से
नहीं बढ़ता और ये अधिकतर छरहरे होते हैं। इनका मेटाबॉलिज्म
अच्छा होता है लेकिन इन्हें सर्दी लगने की आशंका अधिक
रहती है। आमतौर पर इनकी त्वचा ड्राइ होती है और नब्ज तेज
चलती है।
स्वभाव - सामान्यतः ये बहुत ऊर्जावान और फिट होते हैं।
इनकी नींद कच्ची होती है इसलिए अक्सर इन्हें
अनिद्रा की शिकायत अधिक रहती है। इनमें कामेच्छा अधिक
होती है। इस तरह के लोग बातूनी किस्म के होते हैं।
मानसिक स्थिति - ये बहुमुखी प्रतिभा के धनी होते हैं और
अपनी भावनाओं का झट से इजहार कर देते हैं।
हालांकि इनकी याददाश्त कमजोर होती है और आत्मविश्वास
अपेत्राकृत कम रहता है। ये बहुत जल्दी तनाव में आ जाते हैं।
डाइट - वात युक्त शरीर वाले लोगों को डाइट में अधिक से
अधिक फल, बीन्स, डेयरी उत्पाद, नट्स आदि का सेवन अधिक
करना चाहिए।�
पित्त युक्त शरीर
आयुर्वेद के अनुसार, पित्त युक्त शरीर का स्वामी आग है।
बनावट -� इस तरह के शरीर के लोग आमतौर पर मध्यम कद-
काठी के होते हैं। इनमें मांसपेशियां अधिक होती हैं और इन्हें
गर्मी अधिक लगती है। अक्सर ये कम समय में ही गंजेपन
का शिकार हो जाते हैं। इनकी त्वचा कोमल होती है और इनमें
ऊर्जा का स्तर अधिक रहता है।
स्वभाव - इस तरह के लोगों को विचलित करना आसान
नहीं होता। इन्हें गहरी नींद आती है, कामेच्छा और भूख तेज
लगती हैं। आमतौर पर इनके बोलने की टोन ऊंची होती है।
मानसिक स्थिति - इस तरह के लोग आत्मविश्वास और
महत्वाकांक्षा से भरपूर होते हैं। इन्हें परफेक्शन की आदत होती है
और हमेशा आकर्षण का केंद्र बने रहना चाहते हैं।
डाइट - पित्त युक्त शरीर के लिए डाइट में सब्जियां, फल, आम,
खीरा, हरी सब्जियां अधिक खानी चाहिए जिससे शरीर में
पित्त दोष अधिक न हो।
कफ युक्त शरीर
कफ युक्त शरीर के स्वामी जल और पृथ्वी होते हैं। आमतौर पर इस
तरह के शरीर वाले लोगों की संख्या अधिक होती है।�
बनावट - इनके कंधे और कमर का हिस्सा अधिक चौड़ा होता है।
ये अक्सर तेजी से वजन बढ़ा लेते हैं लेकिन इनमें स्टैमिना अधिक
होता है। इनका शरीर मजबूत होता है।
स्वभाव - इस तरह के लोग भोजन के बहुत शौकीन होते हैं और
थोड़े आलसी होते हैं। इन्हें सोना बहुत पसंद होता है। इनमें सहने
की क्षमता अधिक होती है और ये समूह में रहना अधिक पसंद करते
हैं।
मानसिक स्थिति - इन्हें सीखने में समय लगता है और
भावनात्मक होते हैं।
डाइट - कफ युक्त शरीर के लिए डाइट में बहुत अधिक तैलीय और
हेवी भोजन से थोड़ा परहेज करना चाहिए। हां, मसाले जैसे
काली मिर्च. अदरक, जीरा और मिर्च का सेवन इनके लिए
फायदेमंद हो सकता है। हल्का गर्म भोजन इनके लिए अधिक
फायदेमंद है।

आयुर्वेद विश्व की प्राचीनतम चिकित्सा प्रणालियों में से एक है।

आयुर्वेद विश्व की प्राचीनतम चिकित्सा प्रणालियों में से एक
है।
यह अथर्ववेद का उपवेद है। यह विज्ञान , कला और दर्शन
का मिश्रण है। ‘आयुर्वेद’ नाम का अर्थ है, ‘जीवन का ज्ञान’
और यही संक्षेप में आयुर्वेद का सार है। हिताहितं सुखं
दुःखमायुस्तस्य हिताहितम्। मानं च तच्च यत्रोक्तमायुर्वेदः स
उच्यते।।-(च.सू.1/41) आयु+वेद=आयुर्वेद आयुर्वेद और आयुर्विज्ञान
दोनों ही चिकित्साशास्त्र हैं परंतु व्यवहार में
चिकित्साशास्त्र के प्राचीन भारतीय ढंग को आयुर्वेद कहते हैं
और ऐलोपैथिक प्रणाली (जनता की भाषा में "डाक्टरी')
को आयुर्विज्ञान का नाम दिया जाता है।
इस शास्त्र के आदि आचार्य अश्विनीकुमार माने जाते हैं
जिन्होनें दक्ष प्रजापति के धड़ में बकरे का सिर जोड़ा था।
अश्विनीकुमारों से इंद्र ने यह विद्या प्राप्त की। इंद्र ने धन्वंतरि
को सिखाया। काशी के राजा दिवोदास धन्वंतरि के अवतार
कहे गए हैं। उनसे जाकर सुश्रुत ने आयुर्वेद पढ़ा। अत्रि और भरद्वाज
भी इस शास्त्र के प्रवर्तक माने जाते हैं। आय़ुर्वेद के आचार्य ये हैं—
अश्विनीकुमार, धन्वतरि, दिवोदास (काशिराज), नकुल, सहदेव,
अर्कि, च्यवन, जनक, बुध, जावाल, जाजलि, पैल, करथ, अगस्त,
अत्रि तथा उनके छः शिष्य (अग्निवेश, भेड़, जातूकर्ण, पराशर,
सीरपाणि हारीत), सुश्रुत और चरक।



इतिहास
पुरातत्ववेत्ताओं के अनुसार संचार की प्राचीनतम् पुस्तक ऋग्वेद
है। विभिन्न विद्वानों ने इसका रचना काल ईसा के ३,००० से
५०,००० वर्ष पूर्व तक का माना है। इस संहिता में भी आयुर्वेद के
अतिमहत्त्व के सिद्धान्त यत्र-तत्र विकीर्ण है। चरक , सुश्रुत ,
काश्यप आदि मान्य ग्रन्थ आयुर्वेद को अथर्ववेद का उपवेद मानते
हैं। इससे आयुर्वेद की प्राचीनता सिद्ध होती है। अतः हम कह
सकते हैं कि आयुर्वेद की रचनाकाल ईसा पूर्व ३,००० से ५०,०००
वर्ष पहले यानि सृष्टि की उत्पत्ति के आस-पास या साथ
का ही है।
आयुर्वेद के ऐतिहासिक ज्ञान के संदर्भ में सर्वप्रथम ज्ञान
का उल्लेख, चरक मत के अनुसार मृत्युलोक में आयुर्वेद के अवतरण के
साथ- अग्निवेश का नामोल्लेख है। सर्वप्रथम ब्रह्मा से
प्रजापति ने, प्रजापति से अश्विनी कुमारों ने, उनसे इन्द्र ने और
इन्द्र से भारद्वाज ने आयुर्वेद का अध्ययन किया। च्यवन ऋषि
का कार्यकाल भी अश्विनी कुमारों का समकालीन
माना गया है। आयुर्वेद के विकास मे ऋषि च्यवन
का अतिमहत्त्वपूर्ण योगदान है। फिर भारद्वाज ने आयुर्वेद के
प्रभाव से दीर्घ सुखी और आरोग्य जीवन प्राप्त कर अन्य
ऋषियों में उसका प्रचार किया। तदनन्तर पुनर्वसु आत्रेय ने
अग्निवेश , भेल, जतू, पाराशर, हारीत और क्षारपाणि नामक
छः शिष्यों को आयुर्वेद का उपदेश दिया। इन छः शिष्यों में
सबसे अधिक बुद्धिमान अग्निवेश ने सर्वप्रथम एक
संहिता का निर्माण किया- अग्निवेश तंत्र
का जिसका प्रतिसंस्कार बाद में चरक ने किया और
उसका नाम चरकसंहिता पड़ा, जो आयुर्वेद का आधार स्तंभ है।
सुश्रुत के अनुसार काशीराज दिवोदास के रूप में अवतरित
भगवान धन्वन्तरि के पास अन्य महर्षिर्यों के साथ सुश्रुत जब
आयुर्वेद का अध्ययन करने हेतु गये और उनसे आवेदन किया। उस समय
भगवान धन्वन्तरि ने उन लोगों को उपदेश करते हुए
कहा कि सर्वप्रथम स्वयं ब्रह्मा ने सृष्टि उत्पादन पूर्व
ही अथर्ववेद के उपवेद आयुर्वेद को एक सहस्र अध्याय- शत सहस्र
श्लोकों में प्रकाशित किया और पुनः मनुष्य
को अल्पमेधावी समझकर इसे आठ अंगों में विभक्त कर दिया।
इस प्रकार धन्वन्तरि ने भी आयुर्वेद का प्रकाशन ब्रह्मदेव
द्वारा ही प्रतिपादित किया हुआ माना है। पुनः भगवान
धन्वन्तरि ने कहा कि ब्रह्मा से दक्ष प्रजापति, उनसे
अश्विनीकुमार द्वय तथा उनसे इन्द्र ने आयुर्वेद का अध्ययन
किया।
चरक संहिता तथा सुश्रुत संहिता में वर्णित इतिहास एवं आयुर्वेद
के अवतरण के क्रम में क्रमशः आत्रेय सम्प्रदाय
तथा धन्वन्तरि सम्प्रदाय ही मान्य है।
चरक मतानुसार - आत्रेय सम्प्रदाय।
सुश्रुत मतानुसार - धन्वन्तरि सम्प्रदाय।
उद्देश्य
आयुर्वेद का उद्देश्य ही स्वस्थ प्राणी के स्वास्थ्य
की रक्षा तथा रोगी की रोग से रक्षा है। (प्रयोजनं चास्य
स्वस्थस्य स्वास्थ्यरक्षणं आतुरस्यविकारप्रशमनं च)। आयुर्वेद के
दो उद्देश्य हैं :
1. स्वस्थ व्यक्तियों के स्वास्थ्य की रक्षा करना
2. रोगी व्यक्तियों के विकारों को दूर कर उन्हें स्वस्थ
बनाना

हैजा का उपाय

हैजा
1. आक की जड़ की छाल 2 भाग और काली मिर्च 1 भाग,
दोनों को कूट छानकर अदरक के रस में अथवा प्याज के रस में
खरलकर चने जैसी गोलियाँ बना लें, हैजे के दिन में इनके सेवन से हैजे
से बचाव होता है हैजा का आक्रमण होने पर 1-1 गोली 2-2 घंटे से
देने से लाभ होता है।
2. आक का बिना खिला फूल 10 ग्राम तथा भुना सुहागा, लौंग,
सौंठ, पीपल और कालानमक 5-5 ग्राम इन्हें कूट पीसकर 125-125
मिलीग्राम की गोलियाँ बना लें और थोड़ी-2 देर में 1-1
गोली सेवन करावें। विशेष अवस्था में 4-4 गोली एक साथ देवें।
3. आक का फूल 10 ग्राम, भुना सुहागा, 4 ग्राम, काली मिर्च 6
ग्राम, इनको ग्वारपाठा के गूदे में खरलकर चने
जैसी गोलियाँ बना लें, 1-1 गोली अर्क गुलाब से देवें।
4. आक के फूलों की लौंग और काली मिर्च 10-10 ग्राम और शुद्ध
हींग 6 ग्राम इन्हें अदरक के रस की 10 भावनायें देकर उड़द
जैसी गोलियाँ बना रखें। प्रत्येक उल्टी दस्त के बाद 1-1
गोली अदरक, पोदीना या प्याज के रस के साथ सेवन कराने से
तत्काल लाभ होता है।
5. आक के पीले पत्ते जो झड़कर स्वयं नीचे गिर गये हो, 5 नग लेकर
आग में जला दो। जब ये जलकर कोयला हो जाये तो कलईदार बरतन
में आधा किलो पानी में इन्हें बुझा दें, यह
पानी रोगी को थोड़ा-2 करके, जल के स्थान पर पिलावे।

मंगलवार, 16 दिसंबर 2014

टूथपेस्ट के UNEXPECTED USE, जो आपको शायद ही पता हो

टूथपेस्ट के UNEXPECTED USE, जो आपको शायद ही पता हो!
रोजाना सुबह जब हम उठते हैं तो अपनी दिनचर्या से जुड़े कुछ
सामान्य कार्य होते हैं जो सभी अनिवार्य रूप से करते हैं। ब्रश
करना भी हमारी दिनचर्या का ऐसा ही अभिन्न हिस्सा हैं।
दांतों को साफ और मोतियों सा चमकदार दिखाने के लिए लोग
तरह-तरह के टूथपेस्ट का उपयोग करते हैं, लेकिन क्या कभी आपने
सोचा है कि टूथपेस्ट का उपयोग दांत साफ करने के अलावा अन्य
कामों में भी किया जा सकता है। अगर नहीं, तो आज हम
आपको बताने जा रहे हैं टूथपेस्ट के कुछ ऐसे यूज जो आपने कभी सोचे
भी नहीं होंगे।
1. पिंपल की समस्या में टूथ पेस्ट बहुत उपयोगी साबित
हो सकता है। अगर आपको किसी पार्टी में जाना हो और चेहरे पर
पिंपल निकल आए तो रात को सोने से पहले उस पर टूथपेस्ट लगा लें।
रातभर में टूथपेस्ट पिंपल का तेल सोख लेगा और सुबह तक पिंपल बैठ
जाएगा। इस नुस्खे को वो लोग न अजमाएं जिन्हें टूथपेस्ट से
एलर्जी है।
2. माना जाता है कि बच्चों की दूध की बॉटल अगर ठीक से
साफ न हो तो वह कई बीमारियों का कारण बन सकती है।
इसीलिए अगर बच्चों की दूध की बॉटल को अच्छे से साफ करके
स्मैल फ्री बनाने के लिए बॉटल साफ करने के ब्रश पर
थोड़ा सा टूथपेस्ट लगाएं और बॉटल साफ करें।
3. टूथपेस्ट का यूज करके घर पर ही मैनिक्योर किया जा सकता है।
थोड़ी मात्रा में टूथपेस्ट लेकर उसे पानी में घोल लें। अपने
हाथों को उस पानी में डूबो लें कु छ देर तक हाथों को उसमें
डूबा रहने दें फिर हाथों को हल्के-हल्के से मसाज करें। टूथ ब्रश से
नाखून के आसपास की सफाई करें। घर पर ही मैनिक्योर करने का ये
सबसे आसान तरीका है।
4. कपड़े पर टमाटर सॉस या स्याही का दाग लग जाए तो टूथपेस्ट
लेकर उसे कपड़े पर मलें थोड़ी देर रहने दें फिर कपड़े को धीरे-धीरे मलें
दाग दूर हो जाएगा। घर की दीवार बच्चे कलर से खराब कर दे
तो टूथपेस्ट लगाकर रगड़कर साफ कर दें रंग साफ हो जाएगा।
5. यदि कोई जल जाए तो जलन से तुरंत राहत व छालों से बचने के
लिए टूथपेस्ट लगाएं जलन में आराम मिलेगा व जले का निशान
भी नहीं रहता है। कीड़े के काटने पर भी टूथपेस्ट लगा लेने पर राहत
मिलती है।
6. हाथ में अगर किसी तरह की स्मैल आ रही हो और आपको तुरंत
मुक्ति चाहिए तो हाथ में थोड़ा सा टूथपेस्ट लेकर
हाथों को साफ करें हाथ जर्म फ्री के साथ ही स्मैल
फ्री हो जाएंगे। अगर गहनों की चमक फीकी पड़ गई हो और उन्हें
फिर से चमकाना हो तो गहनों पर टूथपेस्ट लगाकर टूथ ब्रश से साफ
करें तो गहने नए से चमकने लगेंगे।
7. आऊच! क्या शेव करते वक्त आपने अपने आप को चोट
पहुंचा ली इसमें कोई आश्चर्य नहीं है। बाथरूम के धुंध से ढ़के कांच के
कारण चेहरा साफ दिखाई जो नहीं दे रहा था। अगली बार
ऐसा न हो इसके लिए कांच पर नॉन जेल टूथपेस्ट लगाकर नहाने से
पहले वाइप करें। आप नहाकर आ जाएंगे तब भी कांच
धुंधला नहीं पड़ेगा।
8. अगर लगातार नेल पालिश लगाने से आपके नाखूनों की चमक
फीकी पड़ गई हो तो नाखूनों से नेल पॉलिश को हटाएं और कुछ
देर तक हल्के हाथों से नाखूनों पर टूथ पेस्ट से मालिश करें। नाखून
चमकने लगेंगे ।